दिव्यांग भी जुनून और हौसलों से खुद को एथलीट के रूप में साबित कर सकते हैं

मोनिका शर्मा, विशेष शिक्षा अध्यापिका (दिल्ली)
जब बात पैरा एथलीट या खिलाड़ियों की हो, तो बात हौसलों के भी ऊपर की है। बात सिर्फ चुनौतियों का सामना करने की नहीं है,बात मेहनत करने की भी नहीं है, ये बात है एक बहुत बड़ी लड़ाई की। ऐसी लड़ाई जो पहले ख़ुद से लड़कर जीतनी होती है, उसके बाद में समाज के दिव्यांगों के प्रति रवैए के ख़िलाफ़ और अंत में खेल के मैदान पर।
शारीरिक दिव्यांग होने के तथ्य को बच्चे को अपने सहपाठियों या दोस्तों के साथ खेलने से नहीं रोकना चाहिए। शारीरिक दिव्यांगता वाले व्यक्ति के लिए खेल बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उनके पर्यावरण के साथ अधिक निकटता का एक साधन प्रदान करता है और आपको अपने खाली समय में सुखद क्षणों में मदद करता है।
बता दें कि पैरालंपिक खेलों की शुरुआत की बड़ी दिलचस्प कहानी है।इन खेलों के मौजूदा स्वरुप की शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध के बाद घायल सैनिकों को मुख्यधारा से जोड़ने के मकसद से हुई। खास तौर पर स्पाइनल इंज्यूरी के शिकार सैनिकों को ठीक करने के लिए इस खेल को शुरू किया गया।साल 1948 में विश्वयुद्ध के ठीक बाद स्टोक मानडेविल अस्पताल के नियोरोलोजिस्ट सर गुडविंग गुट्टमान ने सैनिकों के रिहेबिलेशन के लिए खेल को चुना।तब इसे अंतरराष्ट्रीय व्हीलचेयर गेम्स का नाम दिया गया था।
घायल सैनिकों के लिए कराया स्पोर्ट्स कंपीटिशन साल 1948 में लंदन में हुआ।इतना ही नहीं गुट्टमान ने अपने अस्पताल के ही नहीं दूसरे अस्पताल के मरीजों को भी स्पोर्ट्स कंपीटिशन में शामिल किया।यह प्रयोग काफी सफल रहा और लोगों ने इस आयोजन को काफी पसंद किया। गुट्टमान के इस सफल प्रयोग को ब्रिटेन की कई स्पाइनल इंज्यूरी इकाइयो ने अपनाया और एक दशक तक स्पाइनल इंज्यूरी को ठीक करने के लिए ये रिहेबिलेशन प्रोग्राम चलता रहा।1952 में फिर इसका आयोजन किया गया। इस बार ब्रिटिश सैनिकों के साथ ही डच सैनिकों ने भी हिस्सा लिया।इस तरह इसने पैरालंपिक खेलों के लिए एक ग्राउंड तैयार किया।1960 रोम में पहले पैरालंपिक खेल हुए।पहले पैरालंपिक खेलों में 23 देशों के 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। शुरुआती पैरालंपिक में तैराकी को छोड़कर खिलाड़ी सिर्फ व्हीलचेयर के साथ ही भाग ले सकते थे।लेकिन 1976 में दूसरे तरह के पैरा लोगों को भी पैरालंपिक में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया।
दिव्यांग बच्चों के लिए पैरा स्पोर्ट्स मीट 2022-23 के संबंध में एक दिन का प्रशिक्षण कार्यक्रम समावेशी शिक्षा शाखा, डीओई ने खेल शाखा,शिक्षा निदेशालय दिल्ली क्षेत्र के सहयोग से 10 मार्च को त्यागराज स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में विशेष शिक्षा शिक्षकों और शारीरिक शिक्षा शिक्षकों के लिए एक दिन का प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य खेल गतिविधियों के विवरण, विशेष खेल के लिए आवश्यक संशोधनों को समझना और स्कूल स्तर पर छात्रों को प्रशिक्षण देते समय इसे सुगम बनाना है। इस प्रशिक्षण में लगभग दो हजार अध्यापकों ने भाग लिया।मेरे लिए यह प्रशिक्षण एकदम नवीन था,जिससे मुझे भी अहसास हुआ कि खेलों में भाग लेना हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है। दिव्यांगों के लिए तो यह और भी विशेष हो जाता है।
दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार (RPWD) अधिनियम 2016 की धारा 16 (i) में प्रावधान है कि “उपयुक्त सरकार और स्थानीय प्राधिकरण यह प्रयास करेंगे कि उनके द्वारा वित्त पोषित या मान्यता प्राप्त सभी शैक्षणिक संस्थान विकलांग बच्चों को समावेशी शिक्षा प्रदान करें और उसके लिए अंत बिना किसी भेदभाव के उन्हें स्वीकार करेगा और दूसरों के साथ समान रूप से खेल और मनोरंजन गतिविधियों के लिए शिक्षा और अवसर प्रदान करेगा” और RPWD अधिनियम 2016 की धारा 30 भी प्रदान करती है कि “उचित सरकार विकलांग व्यक्तियों की खेल गतिविधियों में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए उपाय करेगी।”
उपरोक्त प्रावधानों के अनुपालन में, शिक्षा निदेशालय,दिल्ली सरकार के विद्यालयों में पढ़ने वाले दिव्यांग बच्चों (सीडब्ल्यूडी) के लिए राज्य और जिला स्तरीय पैरा स्पोर्ट्स मीट का आयोजन कर रहा है।प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान टेबल टेनिस श्रेणी के तहत बर्लिन में आयोजित होने वाले विशेष ओलंपिक वर्ल्ड समर गेम्स 2023 के लिए चुने गए बौद्धिक अक्षमता वाले छात्र गोनोसन सिंह की उपस्थिति सभी के लिए प्रेरणास्रोत कही जा सकती है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के शिक्षा निदेशालय में पहली बार जिला स्तर और राज्य स्तर पर पैरा स्पोर्ट्स मीट 2022-23 का आयोजन किया जाएगा। जल्द ही आयोजित होने वाली जिला स्तरीय पैरा स्पोर्ट्स मीट में लगभग 1976 विकलांग/सीडब्ल्यूएसएन भाग लेंगे और राज्य स्तरीय पैरा स्पोर्ट्स मीट में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले भाग लेंगे। इस बार कुल 09 खेल गतिविधियों में 04 इनडोर खेल (शतरंज, कैरम, टेबल टेनिस और बैडमिंटन) और 05 आउटडोर खेल (शॉट-पुट, चर्चा फेंक, लंबी कूद, दौड़ और व्हील चेयर-दौड़) शामिल हैं।
माननीय मुख्य अतिथि आईएएस श्री हिमांशु गुप्ता (निदेशक शिक्षा, एनसीटी दिल्ली सरकार)ने पैरा स्पोर्ट्स मीट की शुरुआत की जो शिक्षा निदेशालय दिल्ली के इतिहास में पहली बार आयोजित की जा रही है। हम सभी को दिल्ली के स्कूलों में पढ़ने वाले विकलांग बच्चों के लिए खेल के क्षेत्र में अवसर पैदा करने और उन्हें सुविधाजनक बनाने के लिए चेंजमेकर की महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।माननीय निदेशक महोदय ने दिव्यांगजनों की क्षमताओं को मजबूत करने के लिए समावेशी शिक्षा शाखा द्वारा की गई पैरा स्पोर्ट्स मीट की अनूठी और महान पहल की सराहना की। उन्होंने उल्लेख किया कि आत्मविश्वास विकसित करने और दिव्यांगजनों के समग्र विकास को सुनिश्चित करने के लिए पैरा स्पोर्ट्स एक महत्वपूर्ण घटक है। उन्होंने विकलांग बच्चों के लिए खेलों से संबंधित उनकी ताकत क्षेत्रों को बढ़ाने के लिए अवसर और सुविधाएं प्रदान करने पर जोर दिया ताकि वे विश्व स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकें। उन्होंने स्कूल स्तर पर दिव्यांगजनों के साथ काम करने वाले विशेष शिक्षा शिक्षकों को ऐसी प्रतिभाओं की पहचान करने, उन्हें तैयार करने और विभिन्न स्तरों पर स्वस्थ तरीके से उनकी भागीदारी को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रेरित किया ताकि वे पैरालंपिक और अन्य मंचों पर हमारे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर सकें।
श्री मुकेश चंद, शिक्षा उप निदेशक (आईईबी) ने दो पहलुओं पर जोर दिया, यानी विभिन्न स्तरों पर खेल आयोजनों में विकलांग बच्चों की भागीदारी को अधिकतम करना और आयोजन के दौरान प्रत्येक बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करना। उन्होंने धन्यवाद प्रस्ताव के साथ सत्र का समापन किया।कुल मिलाकर, यह एक उपयोगी प्रशिक्षण कार्यक्रम था जिसने सभी हितधारकों को सच्ची भावना से जिला स्तर और राज्य स्तरीय पैरा स्पोर्ट्स मीट आयोजित करने के लिए प्रेरित किया।
अगर आप चाहते हैं कि कोई दिव्यांग बच्चा कैसे इन खेलों के प्रति उत्साहित हो और इसके प्रति अपनी रुचि बढ़ाएं तो आपको इसके लिए उन्हें इन खेलों के बारे में पूरी जानकारी देनी होगी।
इसके लिए कई खेलों के लिए वर्तमान रैंकिंग और विश्व रिकॉर्ड संबंधित खेल के तहत सारी जानकारी आईपीसी की वेबसाइट पर देख सकते हैं।
विशेष शिक्षिका होने के नाते मेरा मानना है कि दिव्यांग होना अक्षम होना नहीं है। अगर किसी दिव्यांग व्यक्ति में जुनून और खेलने का हौसला है तो वो पैरा एथलीट बननकर खुद को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साबित कर सकता है। इसके लिए जरूरत होती है सही ट्रेनिंग और उचित मार्गदर्शन की।
मोनिका शर्मा
विशेष शिक्षा अध्यापिका (दिल्ली)



