प्रदूषण दिया है तो खुली हवा में सांस लेने की जगह भी देना….

सुप्रसिद्ध शायर मेराज फैजाबादी के शेर को आज हमने जिया- “ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना, पाँव बख़्शें हैं तो तौफ़ीक़-ए-सफ़र भी देना।” उसी तर्ज पर मेरी दो लाइनें अर्ज हैं:- “प्रदूषण दिया है, तो खुली हवा में सांस लेने की जगह भी देना। हम शहर में रह रहे हैं तो क्या हुआ गौरव, शहर के पास एक गाँव भी देना। जहां दरिया हो झीलें हो, चिड़ियों की चहचहाहट हो, जो आए कोई गम में डूबा, उस पर बरसता खुशियों का समंदर हो। ले चलो मुझे उस जमीं पर ऐ गौरव, जहां खुशियों का बसेरा हो।”
क्या आपने कभी सोचा है कि आप शहर में रहते हुए चंद मिनटों में ही ग्रामीण जीवन एवं प्रकृति का आनंद ले सकते हैं? अधिकांश लोग सोचते हैं कि शहरी जीवन, गांव के जीवन की तुलना में अधिक शानदार जीवन है। लेकिन ऐसा नहीं है। कई मायनों में गंवई जीवन ही अव्वल होता है। आज इंदिरापुरम रनर्स एवं साइकिलिंग ग्रुप द्वारा अमित सिलावट के नेतृत्व में इंदिरापुरम से मात्र 15 किलोमीटर दूर राजनगर एक्सटेंशन क्षेत्र गाजियाबाद के गावों में साइकिल पर सैर की गई। जैसे-जैसे हम गांव की तरफ बढ़े, हमें ताजी एवं स्वच्छ हवा का अनुभव हुआ और प्रदूषण तो जैसे मानो गायब ही हो गया हो।
कहना न होगा कि जिला गाजियाबाद (दिल्ली-एनसीआर का एक एरिया), वैसे तो पॉल्यूशन लिस्ट में देश में सबसे ऊपर है। लेकिन गाजियाबाद क्षेत्र में ही अविश्वसनीय किंतु सत्य स्वरूप कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जिसे प्रकृति ने संजोकर रखे हुए हैं। जनाब, बस आप एक बार साइकिल उठाइए तो सही, और निकल जाइए शहर से दूर गांव की ओर, जहां आपको आसानी से वह धरोहर नजर आ जाएगी। बस आपको जरूरत है एक सही गाइड की, जो हमें वहां तक पहुंचा सके। …और आज हमारा मार्गदर्शन राजनगर एक्सटेंशन निवासी अमित सिलावट और उनके दोस्तों वरुण त्यागी और संतोष कुशवाहा ने किया। जिसके बाद हमने महसूस किया कि वाकई जीवन गांवों में ही बसता है।
गांव के लोगों का हिंडन नदी के खूबसूरत नजारों और ऊबड़-खाबड़ कच्चे रास्तों पर चलती साइकिलों ने मन को मोह लिया। स्कूल जा रहे बच्चों ने तो यह सोचा कि कोई साइकिलिंग की रेसिंग हो रही है और हमें हाथ हिला कर अभिवादन किया। मोरटी गांव के ही एक मित्र ने ताजा मट्ठा और गुड़ का बेहतरीन इंतजाम किया था, वाकई जीभ को ऐसा स्वाद वर्षों बाद आया था, बड़ी-बड़ी कंपनियों की छाछ तो दूर दूर तक भी ना टिक पाए इसके आगे।
फिर जैसे ही हम गांव की तरफ बढ़े, हमारे हृदय को आनंदित कर देने वाले  पीली पीली सरसों के लहलहाते खेत और ताजी सब्जियों के खेत वहां दिखाई दिये। ऐसा ही मन में ख्याल आया कि क्यों ना किसी से पूछा जाए कि क्या हम सब्जी ले सकते हैं, तो उन्होंने कहा कि आप यहां से खेत से अपने सामने सब्जी तुड़वा कर ले सकते हैं और यह बहुत ही ताजी और बाजार से सस्ती भी मिलेगी। यह सुनकर मन में सुखद आनंद का अनुभव हुआ और एक विश्वास हुआ कि अभी भी हम शहर के इतने नजदीक रहकर गांव की ताजी सब्जी ले सकते हैं।
यहां हमें सफर में नहर मिली, तालाब और छोटी झील भी देखने को मिली। गांव की सड़क के किनारे नहर की दीवार पर बगुलों और चिड़ियों की कतार भी देखी, वैसे मानो वो हम सबसे कुछ कहना चाह रही थीं। चिड़ियों की मधुर आवाज ने माहौल में एक मधुर संगीत घोल दिया था। शहरी शोरगुल, हॉर्न की कानफोडू आवाजों के आदी हो चुके कानों को ये संगीत बहुत ही प्यारा लगा। हम भी अपने शहरी अंदाज में उन्हें गुड मॉर्निंग कह कर मन ही मन खुश हो लिए।
हम गांव में भोर में पहुंचे थे। ऐसे में झील के किनारे हमें उगता हुआ सूर्य दिखाई दिया, जो दृश्य बहुत ही मनोरम था। रास्ते में हमने ताजा बन रहे पेठा को कारखाने में जाकर खाया। पेठे को कैसे बनाया जाता है उसका भी अनुभव पहली बार किया। हमने अनुभव किया कि गांव के लोग असली सुंदरता का आनंद ले सकते हैं। सुबह के उगते सूरज के साथ, शाम के समय ढलते सूरज का सूर्यास्त, उसकी अप्रितम सुंदरता व प्रकृति का आनंद ले सकते हैं।
हमने उस इलाके में बड़े-बड़े 20 से अधिक क्रिकेट के ग्राउंड भी देखे। अमित सिलावट ने बताया कि वह इन ग्राउंड में अक्सर दौड़ने आते हैं और आसपास के क्षेत्र के अलावा दिल्ली से लोग क्रिकेट मैच खेलने इन क्रिकेट ग्राउंड पर आते हैं। हमने देखा कि ग्रामीण जीवन में यहां एक बहुत ही सुंदर वातावरण है। इतने वाहन नहीं हैं। ग्रामीण लोगों ने इतने सारे पौधे उगाए हुए हैं कि ये पर्यावरण के लिए वरदान हैं, उससे ही हवा इतना शुद्ध और ताजी है।
हमारे साथ करीब 20 साइकिलिस्ट साथियों ने इस यात्रा का भरपूर आनंद लिया। जिसके बाद उन्हें यह एहसास हुआ कि यदि हम अपने आसपास की जगह को साफ सुथरा रख सकें और अगर हम सब मिलकर के यह प्रण ले लें कि हम कचरे का उचित निस्तारण करेंगे और अपनी प्रकृति और गांव को बचाने के लिए कतिपय ठोस कदम उठाएंगे तो हम मानव जीवन के लिए एक उचित वातावरण बना पाएंगे।
एक अन्य गांव शाहपुर में चाय का आनंद आग सेंकते हुए लिया। बहुत ही मजेदार ग्रामीण राइड रही ये। हम लोग हजारों रुपए खर्च करके समय लगाकर इधर उधर घूमने जाते हैं, लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो जो खुशियां हमारे पास ही बिखरी पड़ी हैं उनको यदि समेटा जाए, सहेजा जाए तो क्या बात हो जाए। इसलिए आज की ये राइड समर्पित करता हूं उस ग्रामीण परिवेश को जो हमारी संस्कृति में रचता और बसता है।
कहना न होगा कि साइकिलिस्ट ग्रुप के हर एक सदस्य ने इस राइड का हृदय से आनंद लिया और आयोजक को जी भर भर कर आशीर्वाद और शुभकामनाएं दीं। सबका मानना था कि यह 3 घंटे की राइड जीवन की एक अमूल्य यादगार क्षण बन कर उनके हृदय में संजोए रहेगी। प्राकृतिक छंटाओं से परिपूर्ण जगहों पर ग्रुप के मेंबरों ने बढ़ चढ़ कर फोटोग्राफी की और अपने आनंद के पलों को मानों सदियों के लिए संजो लिया। वाकई, साइकिल की घंटी की आवाज जब जब कानों में पड़ती हैं, मुड़कर देखता हूँ तो बचपन की यादें दिल में सजती है।

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