इतिहास के पन्नों दफ़्न ना हो जाये संयुक्त परिवार 

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शैक्षणिक सत्र के दौरान छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों को फैमली-ट्री बनाने बनाने का गृह कार्य दिया गया। उद्देश्य था की बच्चों के शिक्षण के दौरान परिवार के प्रति चेतना और वंश के प्रारंभ होने की स्थितियों से परिचित कराते हुए, नैतिक मूल्यों का उद्गार हो। बस्ते लटकाये, बच्चे घर में पहुंचे। उन्ही में से किसी एक बच्चे के घर का दृश्य अंकन करने का प्रयास करता हूँ। फैमली-ट्री बनाने के लक्ष्य में माता-पिता और खुद को पा रहा था। फैमली- ट्री के डिजाइन वाले पेपर में सेब के आकारों में माता-पिता के फोटो चिपकाकर बोला, हमारा परिवार इतना छोटा है…? सिर्फ तीन लोग ही नज़र आ रहे हैं। पिता के आगमन से पहले ही मुंह लटके प्रतीत हो रहे थे। बच्चा रोया तो नहीं था, मगर भावनाओं के भीतर छोटे परिवार के कॉन्सेप्ट से हीन हो रहा, लगभग उदासीन हो गया। पिता बोले आओ आपके विद्यालय के दिये गए गृहकार्य को हम चुटकियों में हल कर दिये देते हैं। दादा-दादी और चाचा- चाची के फोटो वाट्सएप के डीपी पर है। डाउनलोड कर फटाक से प्रिंट किये देते हैं। कल जाकर स्कूल में मास्टर जी को पूरा वंश चार्ट दिखा। हमारे परिवार का पूरा चार्ट दिखाना। ऐसा बता कर पिता ने सारे चार्ट भर दिये। बच्चा लेकिन बोला ये लोग तो हमारे साथ नहीं रहते हैं। पापा जी बताओ ये अब कहाँ रहते हैं? बच्चे के प्रश्न का उत्तर देना ज्यादा जटिल नहीं था, लेकिन पिता कुटिलता से बात टाल गया। बटवारे की बात पर पीठ थपथपाई और शेष बच्चे के प्रश्नों का शोर वह भूल गया।
वास्तव में संयुक्त परिवार का कॉन्सेप्ट पुरातन काल से रहा है। जब मनुष्य आदिम था, तभी से वह समूह और आपसी बंधुत्व से वाकिफ हो चुका था। इसी कड़ी में सभ्यता के विकास दौर में उसने परिवार के महत्व को समझा और उस समय परिवार की संज्ञा ही सम्पूर्ण परिवार की थी। इसी संदर्भ में इरावती कर्वे कहती हैं कि, ‘संयुक्त परिवार उन लोगों का समूह हैं जो साधारणतः एक ही छत के नीचे रहते हैं। जो एक ही रसोई में बना हुआ भोजन करते हैं। जो सामान्य संपत्ति रखते हैं, जो परिवार के सामान्य पूजा पाठ में भाग लेते हैं और जो एक दूसरे से किसी न किसी प्रकार के बन्धुत्व सम्बन्ध से सम्बन्धित होते हैं।’ इनके कथनानुसार दो स्थिति को प्रदर्शित होती हैं, पहला एक घर में निवास करने वाला होमोसेपियंस का समूह परिवार है। दूसरा पूजा पाठ की संस्कृति अर्थात यह हिन्दू संस्कृति रही है।
वहीं संयुक्त परिवार में स्तरों का बात करें तो इस पर बुलेटिन ऑफ़ दी क्रिश्चयन इंस्टीट्यूट फॉर दी स्टडी ऑफ सोसायटी का नजरिया साफ प्रदर्शित करती है कि, संयुक्त परिवार से हमारा अभिप्रायः उस परिवार से है। जिसमें कई पीढ़ियों के सदस्य एक दूसरे के प्रति पारस्परिक कर्तव्यपरायणता के बंधन में बंधे रहते हैं।’ यानी ऐसा संयुक्त परिवार जिसमें युवा, वयस्क और वृद्धजन तीनों का समावेश हो। जो समय के साथ- चक्रण में पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है। कहने का तात्पर्य है जो युवा हैं वे वयस्क होंगे, जो वयस्क हैं वे वृद्धजनों के मरहूम होने पर उनकी जगह लेगें। और नव वयस्कों के बच्चों युवाओं का जगह लेगें।
संयुक्त परिवार जो सुरक्षा और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सौहार्दपूर्ण प्रतीत होता है। जिसमें नियमित कार्यों का विभाजन लाजमी है। भावी पीढ़ी का समुचित विकास के लिए वृद्धजनों के अनुभवों का संस्कार स्वरूप स्थानांतरित होना संभव है।  संयुक्त परिवार में रहकर कुल व्यय में अल्पता का प्रभाव है। जहाँ लोग भावनात्मक रूप से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं और सहयोग की स्थिति निरंतर निर्मित होती रहती है। वहीं बड़ों के अवलोकन में युवा पीढ़ी  के चरित्र निर्माण में सहयोग लक्षित है। ऐसे मजबूती के साथ अडिगता से खड़े संयुक्त परिवार के नींव में दीमक लगने की बात समझ से परे है।
वर्तमान दौर में नगरीकरण, डिजिटलीकरण और रोजगार के तलाश में लोगों का परिवार से पृथक्करण होना प्रारंभ हो गया। परिवर्तन के इस दौर में परिवारों के वरिष्ठ का पारिवारिक प्रशासन टूटने लगा।इसी दौर में पारिवारिक स्थितियों और भोग विलास की ओर आकर्षित करती पाश्चात्य की मरीचिका वाली संस्कृति का स्वांगीकरण लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा। जिसके फलस्वरूप भी संयुक्त परिवारों में बिखराव की स्थितियां निर्मित होने लगी है। भोगवादी संस्कृति ने उपभोक्तावाद को जिस तरह से बढ़ावा दिया है। जिसके फलन बाहरी चमक-दमक से ही आदमी को पहचान ने का परम्परा बढ़ी गई। जोकि बड़ा भयानक है। उससे ही अपसांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता गया और ये ही स्थितियां पारिवारिक बिखराव का बड़ा कारण बन रही है। ये स्थितियां परिवार के सदस्यों में आपसी वैमनस्यता की हल्की दरार को खाई में परिवर्तन करने में सक्षम रही। जिसके परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार टूटकर ‘हम दो-हमारे दो, बाकियों को दूर रहने दों’ की संस्कृति का उत्थान हो गया।
ऐसा भी नहीं है की आज संयुक्त परिवार की संस्कृति पूरी तरह से विलुप्त हो गई हो। लेकिन यह जरूर है की निरंतरता से सिमटती जा रही है। जब तक गलतफहमी में उत्पन्न होने वाले सवालों का जवाब अब खुद से तय करेंगे तो निश्चित है की बैर तो बढ़ेगा ही यहीं बैर की स्थिति परिवार को बटवारे के टूटन में झौंक देती है। यदि हमनें अपनों का, अपनी संस्कृति का, अपने दार्शनिक विचारों से पृथक होकर पाश्चात्य का अंधानुकरण करने लगे तो निश्चय ही वह दिन दूर नहीं जब संयुक्त परिवार का कॉन्सेप्ट किताबों के पन्नों में मिलेगा।
लेखक: पुखराज प्राज, छत्तीसगढ़

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