Editorial : दीपों के पर्व
Editorial: Festival of Lights

Editorial : दिवाली की तैयारियां कई दिनों पहले से की जा रही है। दिवाली पर पूरे घर की साफ सफाई के साथ ही घर को दीयों और रंगबिरंगी लाइटों से सजाया जाता है। हर वर्ष दीपोत्सव का पर्व 5 दिनों तक धनतरेस से शुरू होकर नरक चतुर्दशी यानि छोटी दिवाली , बड़ी दिवाली, गोवर्धन पूजा और अंत मे भाई दूज पर्व के रूप में मनाया जाता है।
त्योहारों का जो वातावरण धनतेरस से प्रारम्भ होता है,वह दिवाली के दिन यह पर्व श्रखंला पूरे चरम पर होती है। यह पर्व अलग-अलग नाम और विधानों से पूरी दुनिया में मनाया जाता है। इसका एक कारण यह भी कि इसी दिन अनेक विजयश्री युक्त कार्य हुए हैं। बहुत से शुभ कार्यों का प्रारम्भ भी इसी दिन से माना गया है।
इसी दिन उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राजतिलक हुआ था। विक्रम संवत का आरंभ भी इसी दिन से माना जाता है। दीपों के पर्व की हमारे जीवन में बहुत महत्ता है। मनुष्य के जीवन में आज अज्ञानता का अंधकार तेजी से फैलता जा रहा है। यदि हमें इससे दूर करने का प्रयास नहीं करेंगे तो जीवन में कभी भी रोशनी का प्रकाश नहीं फैल पाएगा। हम केवल रस्मों के रूप में ही दिवाली मना लेते है, लेकिन उसके आध्यात्मिक रहस्यों से विमुख हो रहे हैं।
यदि हमें हर घर को रोशन करना है तो जीवन में ज्ञान का दीपक जलाना होगा। कहा जाता है कि दिवाली मनाने से लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर स्थायी रूप से सदगृहस्थों के घर निवास करती हैं। यानी यह नए वर्ष का प्रथम दिन भी है। इसी दिन व्यापारी अपने बही-खाते बदलते हैं तथा लाभ-हानि का ब्यौरा तैयार करते हैं। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है।
लोगों में दिवाली की बहुत उमंग होती है। ब्रह्मपुराण के अनुसार कार्तिक अमावस्या की इस अंधेरी रात्रि अर्थात अर्धरात्रि में महालक्ष्मी स्वयं भूलोक में आती हैं और प्रत्येक सद्गृहस्थ के घर में विचरण करती हैं। जो घर हर प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध और सुंदर तरीके से सुसज्जित और प्रकाशयुक्त होता है वहां अंश रूप में ठहर जाती हैं और गंदे स्थानों की तरफ देखती भी नहीं।
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इसलिए इस दिन घर-बाहर को ख़ूब साफ-सुथरा करके सजाया-संवारा जाता है। लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ करते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बांटते हैं,एक दूसरे से मिलते हैं।



