Editorial-संसद सत्र : जनहित बनाम राजनीतिक संघर्ष
Editorial-Parliament Session: Public interest versus political conflict

Editorial-जुलाई 2025 में आयोजित संसद का मानसून सत्र कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। यह सत्र एक ओर जहां सरकार के प्रमुख विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने का मंच बना, वहीं दूसरी ओर विपक्ष ने इसे सरकार की विफलताओं को उजागर करने और जनसमस्याओं पर ध्यान केंद्रित कराने के लिए एक सशक्त मंच के रूप में इस्तेमाल किया। लेकिन अफसोस की बात यह रही कि इस सत्र में राजनीतिक टकराव और हंगामों ने लोकतांत्रिक संवाद की मूल भावना को कई बार पीछे छोड़ दिया।
इस बार संसद में महिला आरक्षण विधेयक, कृषि सुधारों पर संशोधन प्रस्ताव, और डिजिटल डेटा संरक्षण विधेयक जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा अपेक्षित थी। महिला आरक्षण विधेयक को लेकर कुछ सकारात्मक प्रगति अवश्य देखने को मिली, लेकिन बाकी विधेयकों पर राजनीतिक ध्रुवीकरण ने सार्थक बहस की संभावनाओं को सीमित कर दिया।
एक बड़ी चिंता का विषय यह रहा कि कई दिन विपक्ष के बहिर्गमन, वेल में प्रदर्शन, और कार्यवाही स्थगन की भेंट चढ़ गए। इससे न केवल संसदीय समय का नुकसान हुआ बल्कि जनता के महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं, और राज्यों के वित्तीय संकट जैसे विषय हाशिए पर चले गए।
विपक्ष का आरोप था कि सरकार चर्चा से बच रही है और महत्वपूर्ण विधेयकों को जल्दबाज़ी में पारित कर रही है, वहीं सरकार का तर्क था कि विपक्ष संसद को काम नहीं करने दे रहा। इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच आम जनता की आकांक्षाएं और लोकतंत्र की गरिमा दोनों ही प्रभावित हुईं।
संसद लोकतंत्र का मंदिर है और इसमें संवाद, बहस और विचारों की टकराहट से समाधान निकलते हैं। दुर्भाग्यवश, जुलाई 2025 का सत्र ऐसी रचनात्मक बहसों से अधिक टकराव और राजनीतिक रणनीति का अखाड़ा बनकर रह गया।
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अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक दल आत्मचिंतन करें। जनता ने उन्हें संसद में लड़ाई के लिए नहीं, बल्कि नीति-निर्माण, जवाबदेही और समाधान के लिए चुना है। संसद के हर क्षण का मूल्य करोड़ों नागरिकों की आशाओं से जुड़ा होता है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।



