Editorial : बुलडोजर की कार्रवाई की योजना

Editorial: Bulldozer action plan

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Editorial:दिल्ली की पहचान उसके ऐतिहासिक स्मारकों, विविधता और राजनीतिक हलचलों के साथ-साथ उस अनगिनत अवैध कॉलोनियों से भी जुड़ी है, जिनमें लाखों लोग वर्षों से जीवन गुजारते आ रहे हैं। ये वही कॉलोनियां हैं, जो शहरीकरण के बढ़ते दबाव और आवासीय ज़रूरतों के चलते अस्तित्व में आईं, और अब सत्ता परिवर्तन के साथ एक बार फिर संकट में हैं। दिल्ली में बीजेपी सरकार के आगमन के साथ ही इन कॉलोनियों पर बुलडोजर की आहट सुनाई देने लगी है, जिसने हजारों लोगों के जीवन में असुरक्षा और भय की स्थिति उत्पन्न कर दी है।

वर्षों से जिन कॉलोनियों को वैधता की दिशा में लाने की प्रक्रिया चल रही थी, वे अचानक सरकार की कार्रवाई सूची में शामिल हो गईं। इससे न केवल आमजन के मन में ग़ुस्सा और चिंता है, बल्कि इस सवाल ने भी जन्म लिया है — “आख़िर कहां जाएंगे ये लोग?”

इन कॉलोनियों की उत्पत्ति का इतिहास देखें तो अधिकांश जगहों पर बिल्डर माफिया और भूमाफिया ने राजनीतिक संरक्षण में बसावट की शुरुआत की। लोगों को सस्ते दामों में ज़मीनें बेची गईं, जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी के ज़रिये मालिकाना हक़ सौंपा गया और धीरे-धीरे ये कॉलोनियां आबाद होती गईं। कई जगहों पर बिजली-पानी के कनेक्शन भी सरकारी एजेंसियों ने दिए, जिससे यह उम्मीद बंधी कि इन बस्तियों को एक दिन वैधता मिल जाएगी।

लेकिन अब जब सरकार बदल गई है, तो वैधता की राह पर चल रही ये कॉलोनियां अचानक गैरकानूनी घोषित की जा रही हैं और उनके खिलाफ बुलडोजर की कार्रवाई की योजना बनाई जा रही है। हाल ही में एक सूची जारी की गई है, जिसमें उन कॉलोनियों के नाम हैं जहां “अवैध निर्माण हटाने” की कार्रवाई प्रस्तावित है। इससे लोगों में दहशत है, और विरोधस्वरूप धरना-प्रदर्शन भी शुरू हो चुके हैं।

दिल्ली की राजनीति में झुग्गी-झोपड़ी और कॉलोनियों का हमेशा एक बड़ा हिस्सा रहा है। पहले की सरकारों ने इन्हें वोटबैंक मानकर कई बार वैधता की घोषणाएं कीं। यहां तक कि कुछ कॉलोनियों को आंशिक मान्यता भी दी गई, जिससे रहवासियों को कानूनी रूप से थोड़ा बहुत राहत मिली। लेकिन सत्ता बदलते ही अब इन जगहों को अतिक्रमण बताकर हटाने की कवायद चल रही है।

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बुलडोजर का तर्क ये दिया जा रहा है कि ये निर्माण अवैध हैं और कानून का उल्लंघन करते हैं। पर सवाल ये है कि जब इन्हें बसाया गया था, तब सरकारी तंत्र कहां था? क्या तब कोई योजना या मास्टर प्लान लागू नहीं था? क्या अब दोष सिर्फ उन ग़रीबों का है, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से एक छोटा सा ठिकाना बनाया?

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