Editorial : सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक कुम्भ
Editorial: Aquarius, symbol of cultural heritage

कुम्भ मेले के अवसर पर इस संगम स्थल में आयोजित होने वाले कुम्भ पर्व में करोड़ों श्रद्धालु एकत्र होते हैं और नदी में स्नान करते हैं, धार्मिक आयोजनों व आध्यात्मिक प्रवचनों में भाग लेते हैं। वर्ष 2013 का कुम्भ प्रयाग में हुआ था। फिर 2019 में प्रयाग में अर्द्धकुम्भ मेले का आयोजन हुआ था। अब 13 जनवरी से 26 फरवरी 2025 तक प्रयाग में महाकुम्भ का आयोजन होगा। इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर व्यापक तैयारी की गई है। खगोलीय गणनानुसार यह मेला मकर संक्रान्ति के दिन प्रारंभ होता है, जब सूर्य और चंद्रमा वृश्चिक राशि में और वृहस्पति, मेष राशि में प्रवेश करते हैं। यह समय आंतरिक रूप से आध्यात्मिक स्वच्छता और आत्मज्ञान के लिए शुभ अवधि का संकेत माना जाता है। कुम्भ मेले को विभिन्न शाही राजवंशों से संरक्षण प्राप्त हुआ, जिनमें दक्षिण में चोल और विजयनगर साम्राज्य, उत्तर में दिल्ली सल्तनत, राजपूत व मुगल मुगल शासकों का संरक्षण मिला। भारतीय संस्कृति में प्रयागराज में अवस्थित गंगा, यमुना और पौराणिक गुप्त सरस्वती के संगम स्थल को अत्यंत पवित्र, धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व का प्रतीक माना जाता रहा है। मकर संक्रान्ति के होने वाले इस योग को कुम्भ स्नानयोग कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलकारी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। पौराणिक मान्यताओं व ज्योतिषिय गणनानुसार कुम्भ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुम्भ राशि में प्रवेश तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ जुड़ा है। ग्रहों की स्थिति हरिद्वार से बहती गंगा के किनारे पर स्थित हर की पौड़ी स्थान पर गंगा जल को औषधिकृत करती है तथा उन दिनों यह अमृतमय हो जाती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आवागमन के साधनों के विकसित होने से महाकुम्भ मेले को और भी अधिक महत्व प्राप्त हुआ, जो राष्ट्रीय एकता और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यूनेस्को द्वारा 2017 में कुम्भ को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता प्राप्त है।



