Editorial : त्रासदी के गुनहगार कौन?

Editorial: Who is the culprit of the tragedy?

open search editorial 5 july 2024

Editorial : हाथरस जिले के सत्संग में तब भगदड़ मच गई, जब गरीब, आम आदमी, महिलाएं आदि भक्त ‘भोले बाबाÓ के पांव छूना चाहते थे। वह आस्था थी या धर्मान्धता थी, हम इस पर टिप्पणी नहीं करेंगे, लेकिन एक औसत इनसान ‘भगवानÓ नहीं हो सकता। सत्संग एक स्वयंभू बाबा का था, जिनके श्रद्धालुओं में मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक, अफसर भी शामिल हैं। भीड़ में इतनी हड़बड़ी थी कि लोगों ने इनसानों को ही कुचल दिया। सवाल हैं कि यदि स्थानीय प्रशासन ने सत्संग की अनुमति दी थी, तो क्या पर्याप्त बंदोबस्त देखे गए थे? जल, चिकित्सा, दवाई, डॉक्टर, एम्बुलेंस और प्रवेश-निकास दरवाजों आदि की व्यवस्था का निरीक्षण किया गया था? क्या पर्याप्त संख्या में पुलिस बल को तैनात किया गया था?

बात अगर हम धार्मिक सामाजिक उत्सवोंसत्संगों की परमिशन देने की प्रक्रिया को जानने की करें तो धार्मिक सत्संग की परमिशन कौन देता है? अगर सत्संग किसी घर या निजी स्थान पर आयोजित किया जा रहा है और इसमें केवल कुछ लोग शामिल हैं, तो आमतौर पर किसी औपचारिक परमिशन की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन अगर सत्संग किसी सार्वजनिक स्थान, जैसे कि पार्क या सामुदायिक केंद्र में आयोजित किया जा रहा है, तो आयोजकों को उस स्थान के प्रबंधन से अनुमति प्राप्त करनी होती है।

एडीजी ने दावा किया है कि मौके पर 40 पुलिस वाले थे। क्या इतनी भीड़ के लिए 40 पुलिस वाले पर्याप्त थे? क्या छोटे से गांव में भीड़ का सैलाब देखकर प्रशासन और पुलिस सतर्क नहीं हुए, लिहाजा बंदोबस्त नहीं किए जा सके। एसडीएम दफ्तर का कहना है कि 50 हजार की भीड़ बताई गई थी, लेकिन 80 हजार से ज्यादा लोग पहुंच गए। स्थानीय पुलिस का कहना है कि हमें कार्यक्रम का जो पत्र मिला था, उसमें भीड़ का कॉलम खाली था। राज्य के सर्वोच्च अधिकारी मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह के बयान कुछ और ही हैं। प्रशासन के स्तर पर ये विरोधाभास क्यों हैं? आखिर किसकी जवाबदेही और जिम्मेदारी है?

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