इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी विधि से वेस्ट यूपी में पहली शल्य चिकित्सा की

# हृदय की नलियों में कैलशिफाइड ब्लॉकेज की बाईपास सर्जरी नहीं की जा सकती, इसलिए वरदान साबित हो रही है इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी विधि
# हृदय की खून की नली को अल्ट्रासोनिक वेव द्वारा, कैल्शियम के जमाव को चूर चूर कर उसे साफ कर उस नली में एंजियोप्लास्टि के माध्यम से सफलतापूर्वक लगाया जाता है स्टेंट 

कमलेश पांडेय, गाजियाबाद। प्रमुख इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ असित खन्ना ने हृदय चिकित्सा क्षेत्र की क्रांतिकारी इलाज पद्धति इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी विधि से गाजियाबाद क्षेत्र में पहली शल्य चिकित्सा करने का रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज कर लिया है। संभवतया पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी इस विधि से अभी तक किसी ने मरीज का उपचार नहीं किया गया है। इस तरह से उन्होंने यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल कौशांबी गाजियाबाद के नाम के साथ ही अपना नाम भी एक बार फिर से रौशन कर लिया है। डॉ खन्ना हॉस्पिटल में सोमवार को आयोजित एक प्रेस वार्ता को संबोधित कर रहे थे।
डॉ असित खन्ना ने आगे बताया कि हृदय चिकित्सा के क्षेत्र में इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी एक क्रांतिकारी इलाज पद्धति है जिससे ऐसे मरीजों को, जिनमें हृदय की नलियों में कैलशिफाइड ब्लॉकेज है और उनकी बाईपास सर्जरी नहीं की जा सकती, उनके लिए यह वरदान साबित हो रही है। उन्होंने अपना पहला अनुभव साझा करते हुए बताया कि हृदय चिकित्सा क्षेत्र की एक अनूठी पद्धति इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी के माध्यम से गाजियाबाद निवासी 55 वर्षीय हृदय रोगी की कैल्शियम जमा होने से बंद हो चुकी हृदय की खून की नली को अल्ट्रासोनिक वेव द्वारा, कैल्शियम के जमाव को चूर चूर कर उसे साफ कर उस नली में एंजियोप्लास्टि के माध्यम से सफलतापूर्वक स्टेंट लगाया गया।
डॉ असित खन्ना ने बताया कि यह गाजियाबाद क्षेत्र में पहला केस है जिसे इस विधि द्वारा खोला गया है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी शायद इस विधि से अभी तक किसी ने मरीज का उपचार नहीं किया है। उन्होंने इस बारे में विस्तार पूर्वक बताते हुए कहा कि सामान्यतयः मरीजों की ह्रदय की नली में ब्लॉकेज होने पर उसे एंजियोप्लास्टी कर बलूनीन्ग् एवं स्टेंटिंग कर खोल दिया जाता है, किंतु जिन मरीजों की नली में कैल्शियम जमा होने की वजह से एक कठोर प्लॉक जमा हो जाता है, या नली पथरा जाती है उनमें एंजियोप्लास्टी करने में बहुत दिक्कत आती है और उस नली को ऐसे ही छोड़ना पड़ जाता है। किंतु इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी की विधि के माध्यम से अब उन प्रकार की पथराई हुई नलियों को खोला जा सकता है। उन्होंने आगे बताया कि यह उसी प्रकार है जैसे कि हम गुर्दे की पथरी को लेजर विधि से लिथोट्रिप्सी कर तोड़ते हैं।
हॉस्पिटल के क्लीनिकल डायरेक्टर प्रोफेसर डॉक्टर आर के मणि ने इस मौके पर अपनी बात रखते हुए कहा कि यह क्रांतिकारी इलाज की पद्धति है जिससे ऐसे मरीजों को जिनमें हृदय की नलियों में कैलशिफाइड ब्लॉकेज है और उनकी बाईपास सर्जरी नहीं की जा सकती, उनके लिए यह वरदान साबित हो रही है। उन्होंने बताया कि इस विधि से 80 से 90 प्रतिशत उपचार प्रक्रियाओं में सफलता मिल जाती है और मरीज सामान्य जीवन जी पाता है।
इस प्रेस वार्ता में अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ अनुज अग्रवाल विशेष रूप से मौजूद थे।
प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए हॉस्पिटल के क्लीनिकल डायरेक्टर प्रोफेसर डॉक्टर आर के मणि, प्रमुख इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ असित खन्ना और अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ अनुज अग्रवाल। 2. साथ में खड़े हैं उनकी टीम के सदस्यगण।

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