क्या है आध्यात्मिक मेले कुंभ का महत्व ?

कुंभ मेला पृथ्वी पर लगने वाला सबसे बड़ा आध्यात्मिक मेला है। यह प्रत्येक 12 वर्ष पर आयोजित किया जाता है। इस वर्ष भी महाकुंभ पर्व मकर संक्रांति के दिन से इलाहाबाद में शुरू हो रहा है। पृथ्वी पर लगने वाला यह सबसे बड़ा मेला खगोल गणनाओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन से ही प्रारम्भ होता है। इस दिन को विशेष रूप से मांगलिक माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि इस दिन गंगा यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। किसी भी श्रद्धालु के लिए यह जीवन में महत्वपूर्ण मौका होता है जब वह पवित्र नदी में डुबकी लगाकर पुण्य प्राप्त करने के साथ ही एक ही स्थल पर सभी संतों, दार्शनिकों, गुरु, चेलों, संस्कृति तथा धर्म के प्रचारकों के दर्शन भी प्राप्त कर सकता है।
कुंभ मेले के आकर्षण
कुंभ मेले में अखाड़ों द्वारा किया जाने वाला शाही स्नान मुख्य आकर्षण का केंद्र होता है। इस दौरान विभिन्न अखाड़ों की ओर से भव्य झांकी निकाली जाती है और प्रत्येक एक दूसरे से ज्यादा भव्यता दिखाना चाहता है। शाही स्नान करने जाते समय साधु-संत अपनी अपनी परंपरा अनुसार हाथी या घोड़े पर सवार होकर बैंड-बाजे के साथ या फिर राजसी पालकी में निकलते हैं। इस दौरान आगे-आगे नागाओं की फौज होती है और उसके पीछे महंत, मंडलेश्वर, महा मंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर होते हैं। इस बार पहला स्नान 15 जनवरी को और अंतिम 04 मार्च को पड़ रहा है। साधुओं के स्नान के बाद ही आम लोग गंगा में डुबकी लगाते हैं। हिन्दू धर्म में अखाड़ों के शाही स्नान के बाद संगम में डुबकी लगाने का बड़ा धार्मिक महत्व है। कुंभ पर्व में आम श्रद्धालु एक से पांच बार डुबकी लगाता है, जबकि अखाड़ों के नागा तो एक हजार आठ बार तक नदी में डुबकी लगा जाते हैं।
क्या है कुंभ का महत्व
प्रत्येक बारहवें वर्ष त्रिवेणी संगम पर आयोजित होने वाले पूर्ण कुंभ के बारे में पद्म पुराण में माना गया है कि इस दौरान जो त्रिवेणी संगम पर स्नान करता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है। तीर्थों में संगम को सभी तीर्थों का अधिपति माना गया है। इस संगम स्थल पर ही अमृत की बूंदें गिरी थी इसीलिए यहां स्नान का महत्व है। यहां स्नान करने से शरीर और आत्मा शुद्ध हो जाती है। यहां पर लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान भी करते हैं।

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