सच्चा प्रियतम

अगर हम अपनी ज़िंदगी पर नज़र डालें तो हमें मालूम होगा कि जिन चीज़ों से हम प्यार करते हैं, वे सबकी सब नाशवान हैं। हम अपना सारा जीवन दुनिया और दुनियादारी के झंझटों में गंवा देते हैं। हम सबकी यही कोशिश होती है कि हमारी शारीरिक सेहत अच्छी हो, हमें अधिक से अधिक धन-दौलत मिले, हमारा नाम ऊँचा हो और हमें बहुत बड़ा पद मिले। लेकिन अक्सर हमने अपनी ज़िंदगी में देखा है कि इन चीज़ों से हमारी प्रीत सिर्फ थोड़े समय के लिए ही होती है क्योंकि इनमें से कोई भी चीज़ हमेशा-हमेशा के लिए हमारा साथ नहीं देती।
हमारी सेहत भी हमारा साथ नहीं देती। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती चली जाती है, वैसे-वैसे हमारी सेहत भी ढलती चली जाती है। अगर प्रभु ने हमें सौंदर्य दिया है तो वह भी उम्र के साथ ढल जाता है। जैसा कि कहा गया है कि ”चार दिन की चाँदनी, फिर अंधेरी रात।“ इसी तरह धन-दौलत भी हमारा साथ नहीं देती। हम अपने जीवन में देखते हैं कि जो लोग करोड़पति होते हैं, पलक झपकने भर में उनके पास इतने पैसे भी नहीं होते कि वो दो वक्त की रोटी भी खा सकें। यदि हमारे पास कोई औहदा, पद या कुर्सी है तो वह भी हमारे साथ हमेशा नहीं रहती।
इसके अलावा हम यह भी देखते हैं कि इस दुनिया की नाम और शौहरत भी सदा के लिए हमारे साथ नहीं रहती। हमारे दोस्त, मित्र और रिश्तेदार जब तक हमारे पास धन-दौलत, शौहरत और कुर्सी होती है, तब तक वे हमारे आस-पास घूमते हैं और हमें विश्वास दिलाते हैं कि यदि कहीं हमारा पसीना गिरेगा तो वे अपना खून बहा देंगे। पर जब किस्मत हमसे नज़रे फेर लेती है तो देखिए वे लोग किस तरह हम से आँखें चुराना शुरू कर देते हैं।
हम अक्सर यह देखते हैं कि जब किसी इंसान का आखिरी वक्त आता है तो उसके करीबी रिश्तेदार उससे यह पूछते हैं कि बताओ धन-दौलत कहाँ रखी है? सोना कहाँ दबाया हुआ है? और जो हमारे परिवार के सदस्य होते हैं वे हमारे शरीर को या तो शमशान में लेकर जला देते हैं या कब्रिस्तान में दफ़ना देते हैं।
ऐसे में हमारे मन में यह ख्याल आता है कि इस दुनिया में ऐसा कौन है जो हमारा इस दुनिया में भी और अगली दुनिया में भी अंत तक हमारा साथ निभाए? तब हमारा ध्यान प्रभु की ओर जाता है। जब हम अपने धर्मग्रंथों को पढ़ते हैं तो हमें यह पता चलता है कि प्रभु की सत्ता वक्त के किसी पूर्ण गुरु के ज़रिये इस दुनिया में काम करती है, वे ही हमारे सच्चे प्रियतम हैं। इसलिए हमें केवल उन्हीं से प्रीत करनी चाहिए। हमारा सच्चा साथी और सच्चा प्रियतम केवल गुरु ही है, जो हमें नाम के साथ जोड़कर प्रभु की ज्योति और श्रुति का अनुभव करा देता है।
अंत समय दो चीजें ही हमारे साथ जाने वाली हैं, एक नाम और दूसरा गुरु। असल में वे दोनों एक ही हैं क्योंकि नाम भी गुरु की देन है और गुरु सदेह नाम है। हम तो इस दुनिया की प्रीत को ही सच्चा मानते हैं, मगर वक्त के साथ-साथ यह साबित हो जाता है कि वह भी झूठी है।
गुरु शब्द का मतलब भी यही है कि जो हमें अंधकार में से निकालकर प्रकाश की तरफ ले चले। इसलिए हमें केवल अपने गुरु के चरण-कमलों में ही प्रीत लगानी चाहिए क्योंकि गुरु के सिवाय कोई भी हमारा सच्चा दोस्त या मित्र नहीं है। हमें यही चाहिए कि अगर गुरु खुशकिस्मती से हमें अपने चरण-कमलों में बुला ले और हमें नामदान की बख्शीश कर प्रभु की ज्योति और श्रुति का अनुभव करा दे तो फिर हमें दिलों-जान से उसकी शिक्षाओं पर चलना शुरू कर देना चाहिए और अपना सब कुछ उस पर न्यौछावर कर देना चाहिए। अगर हम अपना सब कुछ गुरु पर न्यौछावर कर देंगे तो फिर वह धीरे-धीरे हमें जिस्म-जिस्मानियत से ऊपर ले जाएंगे। हम एक ऐसे वातावरण में होंगे जहाँ सरमस्ती ही सरमस्ती होगी और हम धीरे-धीरे प्रभु में लीन हो जाएंगे।
रूहानियत का यही उसूल है कि इंसान और प्रभु के बीच में जो खुदी का पर्दा है, जब यह पर्दा गुरु की दयामेहर से हट जाता है तो इंसान खुदा बन जाता है। गुरु ही ऐसी हस्ती है जो हमें हमेशा के लिए प्यार करते हैं। वे इस संसार में भी हमारे सच्चे साथी, संगी और सलाहकार हैं। वे हमें अपनी छत्रछाया में रखते हैं और रूहानी मंडलों में ले जाते हैं। जहाँ वे हमें अपने आप में लीन कराकर हमें अपने निजघर सचखंड पहुँचा देते हैं और फिर हमारी आत्मा को प्रभु में लीन करा देते हैं। तभी हमारी ज़िंदगी का ध्येय पूरा होता है और चौरासी लाख जियाजून के चक्र से हम मुक्ति पा जाते हैं।
तो आईये! हम संकल्प करें कि ज़िंदगी का जो समय नष्ट हो चुका है उस ओर हम ध्यान न दें। मगर जो समय बचा है उसमें हम केवल अपने गुरु से प्रीत करें क्योंकि केवल गुरु ही है जिनका इश्क स्थायी है, अमर है और सच्चा है।

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