समुद्री जैव विविधता और अनुसंधान

पुखराज प्राज
समुद्र यानी नीले पानी से भरा एक विस्तृत क्षेत्र है। समुद्र को लेकर मनुष्यों में प्रारंभ से जिज्ञासा की लहरें तेज रही है। समुद्र की लहरें जो हमेशा चुनौतियों और रोमांच के लिए आकर्षित करते हैं। सन 1787 में जॉन फिच ने स्टीम इंजन लगा कर नाव का आविष्कार किया था। वैसे तो नाव के संदर्भ में प्रारंभ अवस्था से होमोसेपियंस ने पानी पर तैरने की कला और लकड़ियों के सहारे से नाव से छोटी यात्राओं को सीख लिया था। वहीं इसी अवधारणा को परिभाषित करने वाले आर्कमिडीज का सिद्धांत कहता है, ‘जब कोई वस्तु पूरी-पूरी या आंशिक रूप से किसी द्रव में डुबोई जाती है। तो उसके भार में कमी आती है। यह कमी वस्तु द्वारा हटाए द्रव के भार के बराबर होती है। बाहर में वह कमी द्रव की उत्प्लावन बल के बराबर होती है।’ ऐसे ही बहुत ये वैज्ञानिकों की जिज्ञासा पानी और पानी से भरे बड़े क्षेत्र यानी समुद्र की ओर रही है।
स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र की तुलना में समुद्री जैव विविधता को हमेशा कम अच्छी तरह से समझा गया है। समुद्री सर्वेक्षण और पानी के भीतर नमूना लेने के स्पष्ट खतरे और आर्थिक चुनौतियां गहराई से वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए बाधाएं रहती हैं और रहेगी। बात करें भारत की तटीय लंबाई 6100 किमी और द्वीपों सहित तटीय लंबाई 7516.6 कि.मी. है। भारत में कुल राज्यों में समुद्री तट वाले राज्यों की संख्या 9 है। जो कि गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा तथा पश्चिम बंगाल तक फैला है। इसके अलावा 4 केंद्र शासित प्रदेशों की सीमा भी समुद्र तट से लगती है। जो दमन और दीव, लक्षद्वीप, पुडुचेरी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तक फैली हुई है। इतने विशाल समुद्रीय तटीय वाले राष्ट्र के लिए समुद्र के प्रति लगाव और पर्यटन का क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा है। इसके साथ ही समुद्र के गहराई विषय में अनुसंधान बढ़ने लगे हैं।
 डीप ओशन मिशन की शुरुआत भारतीय समुद्री सीमा में गहरे समुद्र का अन्वेषण करने के लिए कुछ समय पूर्व प्रारंभ किया गया है। जोकि गहरे समुद्र से संबंधित स्थितियों, जीवन अनुकूल अणुओं, तथा जैविक संघटकों की रचना संबंधी अध्ययन शामिल है। जो पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति पर प्रकाश डालने का प्रयास करेगा। 70 फीसदी जल राशि समाहित इस पृथ्वी के हिस्से में समुद्री जीव-जंतु पाये जाते है। गहरे समुद्र के लगभग 95.8% भाग मनुष्य के लिए आज भी मर्म का विषय बना हुआ हैं। पीआईबी के रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटक के नील अर्थव्यवस्था के प्राथमिकता वाले क्षेत्र तटीय पर्यटन में मदद करेगा। गहरे समुद्र में जैव विविधता की खोज और संरक्षण के लिए तकनीकी नवाचार, सूक्ष्मजीवों सहित गहरे समुद्र की वनस्पतियों और जीवों की जैव-पूर्वेक्षण और गहरे समुद्र में जैव-संसाधनों के सतत उपयोग पर अध्ययन इसका मुख्य केंद्र बनकर उभरेगा।
इस मिशन की छ: उद्देशिकाएं निर्धारित है। जिनमें गहरे समुद्र में खनन और मानव युक्त पनडुब्बी के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास, महासागर जलवायु परिवर्तन परामर्श सेवाओं का विकास, गहरे समुद्र में जैव विविधता की खोज एवं संरक्षण के लिए तकनीकी नवाचार, गहरे समुद्र में सर्वेक्षण व अन्वेषण, समुद्र से ऊर्जा एवं ताजा पानी प्राप्त करना, और समुद्री जीव-विज्ञान के लिए उन्नत समुद्री स्टेशन विकास शामिल है। समुद्री पारिस्थितिकी के संदर्भ में होने वाले इस अनुसंधान से निश्चित ही भावी समय में हम समुद्र के गहरे पानी के अंदर का मर्म समझ पायें। वहां पाने वाले जीवों, खनिजों और समुद्र के अध्ययनों के सहारे जैविक विविधता के समझ को और विकसित कर पायेंगे।

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