Editorial : चुनाव लोकतंत्र की जीवन-रेखा
Editorial: Elections are the lifeline of democracy

Editorial : मतदान छुट्टी या सैर-सपाटे का दिन नहीं है, क्योंकि हम पर देश की संसद और सरकार चुनने का गुरुत्तर दायित्व है। दिनों-दिन घट रहे मतदान प्रतिशत पर देश को चिंतन या चिंता करना चाहिए। इसी को लेकर आज यह भी एक उपाय सुझाया जा रहा है कि कानून में संशोधन कर हर मतदाता के लिए मतदान अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए, किंतु यहां यह भी चिंता का विषय कि ‘क्या हर समस्या का हल कानून है?’ क्या स्वतंत्र देश के नागरिकों को किसी तरह की निजी स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए?
आम चुनाव 2024 के दूसरे चरण में भी मतदान अपेक्षाकृत घटा है। चुनाव के प्रति हम उदासीन या लापरवाह दिखाई दे रहे हैं। पहले दोनों चरणों में 190 लोकसभा सीटों पर मतदान हो चुका है। करीब 35 फीसदी चुनाव सम्पन्न हो चुका है, लेकिन दूसरे चरण की 88 लोकसभा सीटों पर करीब 16 करोड़ पात्र मतदाता थे। उनमें से करीब 4.5 करोड़ मतदाताओं ने वोट नहीं डाले। आखिर क्यों? क्या इसे चुनाव-बहिष्कार माना जाए?
यदि सरकार बदलने के लिए मतदान होना था, तो लबालब भीड़ पोलिंग स्टेशनों के अंदर-बाहर दिखाई देती और मतदान भी 70 फीसदी से ज्यादा होता। कांग्रेस के पास काडर, बूथ कार्यकर्ता और मतदाता को पोलिंग स्टेशन तक पहुंचाने वाले संगठन की कमी देखी जाती रही है, लेकिन मतदाताओं का ऐसा सैलाब भी गायब है, जो 400 पार के जनादेश को सुनिश्चित कर दे।
2019 के दूसरे चरण में जिन सीटों पर भाजपा जीती थी, उन पर 3 फीसदी तक मतदान कम हुआ है। जो सीटें कांग्रेस ने जीती थीं, उन पर 5-10 फीसदी मतदान घटा है। हिंदी पट्टी के प्रमुख राज्यों में मतदान औसतन 7 फीसदी तक घटा है। ये राज्य ही भाजपा के दुर्गनुमा चुनावी गढ़ हैं। क्या यह घटा हुआ मतदान भाजपा के खिलाफ एक ‘खामोश चुनावी लहरÓ है?
इस मुद्दे को देखत हुए तीसरे चरण के मतदान के मद्देनजर भाजपा ने अपनी रणनीति बदलने का फैसला लिया है। करीब 500 नेता और पदासीन कार्यकर्ता मतदान वाले क्षेत्रों में तैनात किए जाएंगे



