Editorial : त्योहार की खुशी और सुरक्षा की अहमियत
Editorial: The joy of festivals and the importance of safety

Editorial : दिल्ली की पतंगबाज़ी सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक पहचान है। मकर संक्रांति, स्वतंत्रता दिवस या किसी भी अवसर पर नीले आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें हमेशा से खुशी और उत्साह का प्रतीक रही हैं। लेकिन आधुनिक समय में इस परंपरा में आई कुछ खतरनाक बदलावों ने इसकी छवि को धूमिल कर दिया है।
आज का मांझा, जो पहले सूती धागे और आटे-चूने से बनता था, अब नायलॉन, प्लास्टिक और कांच पाउडर के खतरनाक मिश्रण से तैयार किया जाता है। इसकी धार इतनी तेज़ है कि यह न केवल दूसरी पतंगें काट देता है, बल्कि राहगीरों, बाइक सवारों और बेबस पक्षियों की जान तक ले लेता है। दिल्ली में हुई कई दर्दनाक घटनाएं इसका सबूत हैं—गर्दन कटने से हुई मौतें, घायल पक्षी और हजारों टूटे परिवारों की कहानियां।
इसी गंभीर खतरे को देखते हुए दिल्ली सरकार ने इस तरह के मांझे पर प्रतिबंध लगाया है। कुछ लोग इसे त्योहार की रौनक पर रोक मानते हैं, लेकिन सच यह है कि कोई भी परंपरा तब तक ही मूल्यवान है, जब तक वह जीवन और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाए।
सिर्फ प्रतिबंध लगाना ही समाधान नहीं है। हमें सुरक्षित विकल्पों की ओर बढ़ना होगा—जैसे शुद्ध सूती धागे का प्रयोग, बिना कांच पाउडर का मांझा, और पतंग उड़ाने के लिए सुरक्षित, खुले स्थान। साथ ही, नियमों का पालन और जनता में जागरूकता फैलाना भी ज़रूरी है।
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पतंगबाज़ी की असली सुंदरता आसमान में रंग भरने में है, खून बहाने में नहीं। त्योहार की खुशी तभी पूरी होगी, जब हम परंपरा को सुरक्षित और जिम्मेदारी के साथ निभाएं।



