Editorial : हिन्दू धर्म की रक्षक रानी अहिल्याबाई होलकर
Editorial: Queen Ahilyabai Holkar, protector of Hinduism

Editorial : रानी अहिल्याबाई ने अपने समय में विभिन्न दिशाओं में सृजन की ऋचाएं लिखी हैं, नया इतिहास रचा है। अपनी योग्यता और क्षमता से स्वयं को साबित किया है। नारी शासक के रूप उन्होंने एक छलांग लगाई, राज-व्यवस्था एवं उन्नत समाज संरचना को निर्मित करते हुए जीवन की आदर्श परिभाषाएं गढ़ी थीं।
वह अपनी प्रजा को अपनी संतान मानती थी। रानी अहिल्याबाई हिन्दू धर्म की पुरोधा, उन्नायक एवं रक्षक थी। उन्होंने बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामेश्वरम, जगन्नाथ पुरी, द्वारका, पैठण, महेश्वर, वृंदावन, सुपलेश्वर, उज्जैन, पुष्कर, पंढरपुर, चिंचवाड़, चिखलदा, आलमपुर, देवप्रयाग, राजापुर स्थानों पर मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाया तथा घाट बनवाएं और धर्मशालाएं खुलवाए, जहां लोगों को प्रतिदिन भोजन मिलता था।
वे हिन्दू धर्म की उच्चतम परम्पराओं, संस्कारों और जीवनमूल्यों से प्रतिबद्ध एक महान विभूति थी, शासक रश्मि थी, सृजन रश्मि थी, नेतृत्व रश्मि थी, विकास रश्मि थी। सनातन धर्म की ध्वजवाहिका थी, एक ऊर्जा थी। उन्हें भारत की सबसे दूरदर्शी एवं साहसी महिला शासकों में से एक माना जाता है।
18वीं शताब्दी में, मालवा की महारानी के रूप में, धर्म का संदेश फैलाने में, नयी शासन-व्यवस्था स्थापित करने और औद्योगीकरण के प्रचार-प्रसार में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा था। अतीत से आज तक वे व्यापक रूप से अपनी बुद्धिमत्ता, साहस और प्रशासनिक कौशल के लिए जानी जाती हैं। राजमाता अहिल्याबाई होलकर का जीवन अनेक संकटों एवं संघर्षों का साक्षी बना।
Editorial : धुल चेहरे पर थी…
एक के बाद एक पहाड जैसे दु:ख, आघात उन्हें झेलने पड़े। 1766 में अहिल्या के ससुर मल्हार राव का भी निधन हो गया। उसके अगले ही वर्ष, उन्होंने अपने बेटे माले राव को भी खो दिया। बेटे को खोने का दु:ख उन्होंने अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। राज्य और अपनी प्रजा के कल्याण को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पेशवा से, मालवा के शासन को संभालने की अनुमति मांगी।



