कैंसर की सही समय पर पहचान होने से इलाज संभव है : डॉ.अरोड़ा

गाजियाबाद: भारत में सिर और गले का कैंसर खासकर ओरल एवं ओरोफेरिंजिल कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और मामलों की संख्या में यह अन्य देशों से बहुत आगे निकल चुका है। विश्व में सिर और गले के कैंसर के कुल जितने मामले हैं उनसे भी ज्यादा भारत में हैं। उसमें भी बीमारू राज्यों में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है जहां पान मसाले और तंबाकू के चलन के कारण सर्वाधिक 2.5 लाख कैंसर के मामले हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के 59 वर्षीय मदनलाल के गले में दर्दनाक अल्सर था, जिस कारण उन्हें दो महीने से कुछ भी निगलने में दिक्कत हो रही थी।

मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ  कैंसर केयर वैशाली गाजियाबाद में डायग्नोसिस करने पर उनकी जीभ के निचले हिस्से में कैंसर का पता चला, तो यहां के डॉक्टरों ने बायोप्सी एमआरआई और पेट सीटी स्कैन जैसी सभी तरह की जांच से रोग के स्टेज का पता लगाया। मरीज के जीभ के निचले हिस्से में जख्म धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था। कई महीनों तक इलाज नहीं मिलने के कारण उनकी स्थिति बिगड़ती जा रही थी। डॉक्टरों की टीम ने ऑन्कोलॉजी विभाग के ट्यूमर बोर्ड के साथ चर्चा की और फिर सर्जरी और इसके बाद रेडियोथेरापी की योजना बनाई।

परंपरागत पद्धतियों से सिर्फ  कैंसर को बढऩे से रोकने और रोग को पूरी तरह खत्म करने पर ही जोर दिया जाता है, लेकिन शारीरिक संरचना बिगडऩे, चेहरा विकृत होने, दाग, दांतों का स्वरूप बिगडऩे, कंधा झुक जाने आदि रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी के बाद भी का ख्याल नहीं रखा जाता है। लेकिन आधुनिक उपचार पद्धतियों की उपलब्धता से न सिर्फ चौथे स्टेज के सिर एवं गले के कैंसर का सफल इलाज हो जाता है, बल्कि न्यूनतम शल्यक्रिया से बेहतर परिणाम भी मिलता है। इस तरह के कैंसर में टीओआरएस सफल साबित हुई है और इसमें अंगों के काम करने के अनुकूल परिणाम भी मिलते हैं। इस मरीज को ऑपरेशन के छठे दिन से खिलाया जाने लगा और बोलने तथा निगलने की क्षमता सुरक्षित रखते हुए एक सप्ताह के अंदर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। मैक्स हॉस्पिटल वैशाली में हेड एंड नेक सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के निदेशक डॉ.सौरभ कुमार अरोड़ा ने कहा श्रोबोट सहायता सर्जरी होने के कारण यह पद्धति लक्षित हिस्से पर सर्वाधिक परिशुद्धता के साथ काम करती है और इसकी न्यूनतम शल्यक्रिया ओपन सर्जरी की संभावना से बचाती है। इस तरह के कैंसर के इलाज की शुरुआती पद्धतियों में कीमोथेरापी और रेडिएशन थेरापी करनी पड़ती थी, लेकिन शुरुआती चरण में यदि कैंसर पकड़ में नहीं आती तो मरीज के लिए ओपन सर्जरी ही अंतिम विकल्प रह जाता था।

दुर्भाग्यवश टीओआरएस के ईजाद से पहले तक परंपरागत सर्जिकल पद्धति से जबड़ा बिगड़ जाता था, जिस कारण रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी के बाद भी चेहरा विकृत हो जाता था। लेकिन अब यह न्यूनतम शल्यक्रिया तकनीक 100 फीसदी सुरक्षित है और यह मुंह तथा गले में दोबारा ट्यूमर होने की संभावना खत्म करने सफल रहती है। डॉ.अरोड़ा कहते हैं कि इस तरह के कैंसर की सही समय पर पहचान होने से इलाज संभव है लेकिन पश्चिमी दुनिया की तुलना में भारत में ऐसे मरीजों के जीवित होने की दर बहुत कम रहती है। गले और सिर के कैंसर के ज्यादातर मामलों की पहचान करना और इलाज करना आसान है। ट्रांस ओरल रोबोटिक सर्जरी जटिल मामलों में भी कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने की आधुनिक पद्धति है। इसके जरिये जीभ, गला, मुंह, लैरिंक्स, फेरिंक्स तथा सिर एवं गर्दन के अन्य हिस्सों में होने वाले कैंसर का इलाज किया जा सकता है।

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